नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं, लेकिन चुनावी राजनीति का डिजिटल अभियान अभी से तेज होता दिखाई दे रहा है। फेसबुक और इंस्टाग्राम पर राजनीतिक और मुद्दा आधारित विज्ञापनों के विश्लेषण में ऐसे कई पेज सामने आए हैं, जो सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पक्ष में प्रचार करते या विपक्षी दलों पर हमला करते नजर आते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, 4 अगस्त से 4 सितंबर के बीच तीन प्रमुख पेजों ने मिलकर करीब 15 लाख रुपये विज्ञापनों पर खर्च किए। खास बात यह है कि इन पेजों पर किसी राजनीतिक दल का आधिकारिक नाम दर्ज नहीं है और विज्ञापनों के ‘paid for by’ डिस्क्लेमर में भी भुगतानकर्ता के रूप में संबंधित पेज का ही नाम दिखाई देता है।
तीन पेज, करीब 15 लाख रुपये का खर्च
विश्लेषण में सामने आए तीन प्रमुख पेजों में ‘Nonstop UP’, ‘Yaad Rakhega UP’ और ‘Bharat Todo Gang’ शामिल हैं।
‘Nonstop UP’ ने उत्तर प्रदेश सरकार के कामकाज और उपलब्धियों के प्रचार पर करीब 7.2 लाख रुपये खर्च किए। ‘Yaad Rakhega UP’ ने समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव को निशाना बनाते हुए करीब 200 विज्ञापनों पर 5.63 लाख रुपये खर्च किए। वहीं ‘Bharat Todo Gang’ ने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी पर हिंदू पहचान से जुड़े मुद्दों को लेकर हमला करने वाले विज्ञापनों पर करीब 1.53 लाख रुपये खर्च किए।
इन पेजों का संचालन कौन करता है, यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों प्रमुख पेज अपनी वेबसाइट के जरिए भी संचालित होते हैं, लेकिन वेबसाइटों पर मालिक या संचालक का नाम उपलब्ध नहीं है। किसी राजनीतिक दल ने भी सार्वजनिक रूप से इन पेजों की जिम्मेदारी नहीं ली है।
विपक्ष के मुकाबले विज्ञापन खर्च में बड़ा अंतर
विश्लेषण में बीजेपी या योगी आदित्यनाथ के खिलाफ प्रचार करने वाले विपक्षी पेजों की गतिविधि इसके मुकाबले बेहद सीमित दिखाई दी। समाजवादी पार्टी से जुड़े पेज का खर्च करीब 1,700 रुपये और कांग्रेस के पेज का करीब 100 रुपये बताया गया है। बहुजन समाज पार्टी और आम आदमी पार्टी के पेज इस अवधि में दिखाई नहीं दिए।
हालांकि, ये आंकड़े केवल एक महीने की तस्वीर पेश करते हैं और उस समय औपचारिक चुनाव प्रचार की खर्च सीमा लागू नहीं थी।
‘Nonstop UP’ का फोकस सरकार की उपलब्धियों पर
‘Nonstop UP’ के विज्ञापनों में 2017 से पहले और वर्तमान उत्तर प्रदेश की तुलना की गई है। बिजली, सड़क, एक्सप्रेसवे, सरकारी नौकरियों और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी गई है।
विज्ञापनों में सरकार की उपलब्धियों के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम और #YogiAdityanath, #BulldozerBaba और “BJP Modi Yogi” जैसे हैशटैग भी इस्तेमाल किए गए हैं। कुछ विज्ञापनों में अयोध्या, मथुरा और काशी से जुड़ी धार्मिक एवं आर्थिक गतिविधियों को भी प्रचारित किया गया।
अखिलेश यादव पर हमले के लिए करीब 200 विज्ञापन
‘Yaad Rakhega UP’ ने करीब 200 विज्ञापनों के जरिए समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के 2012-17 के शासनकाल को निशाना बनाया।
इन विज्ञापनों में कानून-व्यवस्था, दंगे, अपराध और कथित भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को उठाया गया। अखिलेश यादव के लिए ‘टिप्पू’ जैसे राजनीतिक तंज का इस्तेमाल भी किया गया और समाजवादी पार्टी के शासन को नकारात्मक तरीके से पेश किया गया। एक विज्ञापन में मतदाताओं से उत्तर प्रदेश को कथित तौर पर दोबारा कुशासन की ओर जाने से बचाने की अपील की गई।
कांग्रेस और AAP भी निशाने पर
‘Bharat Todo Gang’ के विज्ञापनों का फोकस केवल उत्तर प्रदेश की राजनीति तक सीमित नहीं रहा। इनमें कांग्रेस और आम आदमी पार्टी पर राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों को लेकर निशाना साधा गया।
कुछ विज्ञापनों में कांग्रेस और ‘वंदे मातरम’ को लेकर सवाल उठाए गए, जबकि दूसरे विज्ञापनों में आम आदमी पार्टी को दिल्ली दंगों और पंजाब से जुड़े मुद्दों पर निशाना बनाया गया। विज्ञापनों में लोगों से कमेंट करने की अपील भी की गई, जिससे सोशल मीडिया पर उनकी पहुंच बढ़ने की संभावना रहती है।
सवाल यह कि पैसा कौन लगा रहा है?
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल विज्ञापन के कंटेंट से ज्यादा विज्ञापन के भुगतानकर्ता और संचालन की पारदर्शिता को लेकर है।
रिपोर्ट के मुताबिक, तीनों प्रमुख पेज किसी राजनीतिक दल के आधिकारिक नाम से संचालित नहीं होते। Meta के विज्ञापन रिकॉर्ड में भुगतानकर्ता के रूप में पेज का नाम दिखाई देता है। इससे यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि वास्तव में इन अभियानों के पीछे पैसा किसका है।
यही वजह है कि इन्हें संभावित ‘सरोगेट’ या प्रॉक्सी राजनीतिक प्रचार के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, किसी पार्टी के साथ इन पेजों का प्रत्यक्ष संबंध स्थापित होने की बात रिपोर्ट में सामने नहीं आई है।
BJP ने पेजों से किया किनारा
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता नावेद सिद्दीकी ने आरोप लगाया कि ‘Bharat Todo Gang’ और ‘Yaad Rakhega UP’ जैसे पेज बीजेपी के लिए काम करने वाले सरोगेट पेज हैं। उन्होंने बीजेपी पर विपक्ष के खिलाफ ऐसे माध्यमों का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया।
दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश बीजेपी के सोशल मीडिया प्रमुख हिमांशु राज ने इन पेजों से पार्टी का संबंध खारिज किया। उनका कहना था कि कोई भी व्यक्ति किसी के भी नाम से सोशल मीडिया पेज बना सकता है और पार्टी इन पेजों को नियंत्रित नहीं करती।
Meta की भूमिका पर भी सवाल
रिपोर्ट में Meta की ‘coordinated inauthentic behaviour’ नीति का भी उल्लेख किया गया है। ऐसी नीति का उद्देश्य उन नेटवर्कों के खिलाफ कार्रवाई करना है जो अपने संबंध छिपाकर एक जैसी राजनीतिक सामग्री को समन्वित तरीके से आगे बढ़ाते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, Meta से इस मामले में प्रतिक्रिया मांगी गई थी, लेकिन रिपोर्ट तैयार होने तक कंपनी की ओर से कोई जवाब नहीं मिला था।
सिर्फ राजनीतिक पेज ही नहीं, दूसरे विज्ञापनदाता भी सक्रिय
Meta के रिकॉर्ड में उत्तर प्रदेश से जुड़े विज्ञापनों का पूरा खर्च केवल राजनीतिक पेजों तक सीमित नहीं है। सरकारी योजनाओं के प्रचार से जुड़े पेजों ने भी करीब 3.7 लाख रुपये खर्च किए। इनमें Central Bureau of Communication का खर्च करीब 2.36 लाख रुपये और राज्य की योजनाओं से जुड़े पेजों का खर्च करीब 1.3 लाख रुपये बताया गया है।
इसके अलावा कुछ ऐप और कारोबारी नेटवर्क से जुड़े विज्ञापनदाताओं ने भी बड़ी रकम खर्च की। रिपोर्ट के मुताबिक, ‘Inpix-App’ ने करीब 15.7 लाख रुपये खर्च किए, जबकि तीन जुड़े हुए विज्ञापनदाताओं ने मिलकर करीब 12.4 लाख रुपये खर्च किए। हालांकि, इन खर्चों को सीधे किसी राजनीतिक दल से जोड़ने वाला प्रमाण सामने नहीं आया है।
2027 के चुनाव से पहले डिजिटल राजनीति का नया मैदान
इस पूरे मामले से एक बड़ा सवाल सामने आता है—क्या आने वाले चुनावों में राजनीतिक प्रचार केवल पार्टियों और उम्मीदवारों के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट तक सीमित रहेगा, या अनौपचारिक और कथित सरोगेट पेज भी चुनावी नैरेटिव तय करने में बड़ी भूमिका निभाएंगे?
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में सोशल मीडिया अब केवल सूचना या मनोरंजन का माध्यम नहीं रह गया है। यह मतदाताओं की धारणा बनाने, सरकार की उपलब्धियां गिनाने और विपक्ष पर हमला करने का प्रभावी राजनीतिक माध्यम बन चुका है।
2027 के विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन Meta पर विज्ञापन खर्च के ये आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि डिजिटल चुनावी लड़ाई की जमीन पहले ही तैयार की जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल फिर वही है—जो राजनीतिक संदेश जनता तक पहुंच रहा है, उसके पीछे पैसा किसका है और उसकी जवाबदेही किसकी है