सुप्रीम कोर्ट में SIR और जंतर-मंतर विवाद पर सुनवाई, चुनाव आयोग से जवाब तलब


नरेन्द्र पाण्डेय : एक ही दिन में तीन बड़े सवाल—क्या SIR में गड़बड़ियों की शिकायतों का जवाब मिलेगा? क्या विपक्ष को विरोध प्रदर्शन का अधिकार है? और क्या प्रशासन न्यायालय के आदेशों के दायरे से बाहर जाकर कार्रवाई कर सकता है? नमस्कार मै नरेन्द्र पाण्डेय

सुप्रीम कोर्ट में आज गुरुवार 15 अक्टूबर को हुई सुनवाई ने इन सवालों को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ के सामने चुनाव आयोग के SIR , विपक्षी नेताओं के मार्च, जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने और दिल्ली में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई कार्रवाई से संबंधित मामले आए।

अदालत ने कई मामलों में संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए। प्रदर्शन से जुड़े मामलों में CCTV फुटेज और अन्य डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का निर्देश भी दिया। हालांकि, किसी मामले में नोटिस जारी होना अंतिम फैसला नहीं है।

आज की सुनवाई का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा राहुल गांधी और INDIA गठबंधन के अन्य नेताओं की ओर से दायर वह याचिका रही, जिसमें मतदाता सूची के SIR के दौरान कथित अनियमितताओं और बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने की आशंकाएं उठाई गई हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को नोटिस जारी किया। अदालत ने याचिका को SIR से संबंधित पहले से लंबित मामलों के साथ जोड़ने का निर्देश दिया।

विपक्ष की मांग है कि मतदाता सूची में हुए बदलावों की जांच हो और प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए। याचिकाकर्ताओं ने संबंधित रिकॉर्ड की जांच और स्वतंत्र ऑडिट जैसी राहतों की मांग भी की है। इन मांगों पर अदालत का अंतिम निर्णय अभी आना बाकी है।

यहां सबसे अहम बात है कि मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियादी व्यवस्था का हिस्सा है। किसी पात्र नागरिक का नाम छूटना उसके मताधिकार को प्रभावित कर सकता है। दूसरी ओर, मतदाता सूची को अद्यतन करना भी चुनावी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इसलिए असली सवाल केवल यह नहीं है कि SIR का विरोध कौन कर रहा है, बल्कि यह है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है, नाम हटाने के लिए क्या मानक अपनाए गए हैं और प्रभावित नागरिकों को अपनी बात रखने का अवसर मिलता है या नहीं।

आज की सुनवाई में 12 अक्टूबर को विपक्षी नेताओं के सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च करने और अदालत परिसर में भीड़ जुटने का मुद्दा भी उठा।

इस मामले में अदालत ने कांग्रेस और राहुल गांधी सहित संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट टिप्पणी की कि न्यायपालिका पर दबाव बनाने या उसे प्रभावित करने का प्रयास स्वीकार्य नहीं है। पीठ ने यह भी कहा कि एक याचिकाकर्ता को अपने आचरण के बारे में जवाब देना होगा।

इस घटनाक्रम को समझने के लिए दो बातों में अंतर करना जरूरी है।

पहली, विपक्ष को चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने, याचिका दायर करने और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का अधिकार है। दूसरी, न्यायालय परिसर में किसी मार्च या भीड़ के जरिए न्यायिक प्रक्रिया पर दबाव पड़ने का सवाल अलग कानूनी विषय है।

जंतर-मंतर लंबे समय से दिल्ली में राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों का प्रमुख केंद्र रहा है। दिल्ली पुलिस द्वारा इसे निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।

अदालत ने इस निर्णय पर केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा, लेकिन तत्काल जंतर-मंतर को फिर से प्रदर्शन स्थल घोषित करने का आदेश नहीं दिया।

सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठा कि क्या जंतर-मंतर को सूची से हटाने का निर्णय सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणियों के आधार पर लिया गया था या इसके पीछे कोई अलग प्रशासनिक आकलन था। केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि निर्णय अदालत के आदेश के कारण नहीं, बल्कि पहले गठित समिति की रिपोर्ट के आधार पर लिया गया था।

दिल्ली पुलिस ने रामलीला मैदान, पूर्वी दिल्ली के CBD मैदान और बुराड़ी मैदान को वैकल्पिक प्रदर्शन स्थलों के रूप में नामित किया है।

अब सवाल यह है कि क्या वैकल्पिक स्थान उपलब्ध करा देना नागरिकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की पर्याप्त सुरक्षा करता है? या प्रदर्शन स्थल की दूरी, लोगों की पहुंच और उस स्थान पर अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने की संभावना भी महत्वपूर्ण है?

दिल्ली में हालिया विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई, कथित अवैध हिरासत, आवाजाही पर प्रतिबंध और पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार को लेकर भी याचिकाएं दाखिल की गईं।

सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों में संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए पुलिस और अन्य संबंधित एजेंसियों को प्रदर्शन से जुड़े CCTV फुटेज तथा अन्य डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश दिया। अदालत ने पत्रकारों के साथ कथित यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार से संबंधित याचिका पर भी विचार किया तथा इस विषय में महिला सदस्यों वाली समिति के गठन की संभावना पर सकारात्मक टिप्पणी की।

साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का महत्व इसलिए है, क्योंकि किसी भी विवाद में केवल आरोप और जवाब पर्याप्त नहीं होते। घटनास्थल के वीडियो, पुलिस के आदेश, हिरासत से जुड़े रिकॉर्ड और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान तथ्यों की जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

आज की सुनवाई में पहले दिए गए न्यायिक निर्देशों के अनुपालन से संबंधित अवमानना का मुद्दा भी चर्चा में रहा। यह मामला दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के दौरान मेट्रो और रेल सेवाओं पर व्यापक रोक तथा इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध से जुड़े कदमों से संबंधित है।

पहले के निर्देशों में सुप्रीम कोर्ट ने परिवहन सेवाओं को पूरी तरह बंद करने जैसे व्यापक प्रतिबंधों से बचने की बात कही थी। इसके बाद अधिकारियों की कार्रवाई और न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन पर सवाल उठे।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से बिना शर्त माफी के संदर्भ का भी उल्लेख हुआ। लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि वह केवल मीडिया रिपोर्टों के आधार पर इस विषय में निष्कर्ष नहीं निकाल रही है। संबंधित अधिकारियों के जवाब और मामले के रिकॉर्ड पर विचार किया जाना है।

इस मामले में मूल प्रश्न यह है कि सार्वजनिक सुरक्षा के नाम पर प्रशासन को कितनी छूट मिल सकती है और न्यायिक निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी कैसे तय होगी।

कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन का दायित्व है। लेकिन उसी तरह न्यायालय के आदेशों का सम्मान करना भी अनिवार्य है। किसी भी प्रतिबंध की वैधता और आवश्यकता का मूल्यांकन परिस्थितियों तथा लागू कानून के आधार पर होना चाहिए।

15 अक्टूबर की सुनवाई से तीन प्रमुख बातें सामने आईं।

पहली, SIR से जुड़ी शिकायतों पर चुनाव आयोग को जवाब देना होगा, लेकिन आरोपों की सत्यता और पुनरीक्षण की वैधता पर अंतिम निष्कर्ष अभी नहीं निकला है।

दूसरी, अदालत ने विपक्षी मार्च और न्यायालय परिसर में हुए घटनाक्रम को गंभीरता से लिया है। इससे SIR पर दायर याचिका के मूल प्रश्न का स्वतः समाधान नहीं होता; दोनों विषयों की कानूनी स्थिति अलग है।

तीसरी, जंतर-मंतर, पुलिस कार्रवाई, पत्रकारों की सुरक्षा और परिवहन सेवाओं पर प्रतिबंध से जुड़े मामलों में अदालत ने जवाब मांगे हैं और साक्ष्य सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है। इन मामलों में आगे की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी।

लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना, चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता की मांग करना और शांतिपूर्ण विरोध करना नागरिक अधिकारों का हिस्सा है। लेकिन विरोध और प्रशासन—दोनों को कानून के दायरे में रहना होता है।

अब देखना यह है कि चुनाव आयोग SIR से जुड़े सवालों पर क्या जवाब देता है, केंद्र सरकार जंतर-मंतर के निर्णय का क्या आधार प्रस्तुत करती है और प्रदर्शन से जुड़े मामलों में अदालत के सामने कौन-से तथ्य आते हैं।

 

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